लक्ष्मण युद्धभूमि में निश्चेष्ट पड़े थे। संजीवनी बूटी समय पर नहीं मिल पाई। इसलिए हनुमान ने पूरा पर्वत—द्रोणागिरी—उठा लिया और उसे आकाश मार्ग से ले चले, मालाएँ झूल रही थीं, मंदिर के झंडे हवा में फड़फड़ा रहे थे, उनका मुख शांत था मानो यह संसार की सबसे स्वाभाविक बात हो।
इस छवि में कुछ ऐसा है जो शांति से भीतर तक झकझोर देता है। इतनी नितांत शक्ति, बिना किसी संकोच के अर्पित कर दी गई। ऐसा सहयोग जो बदले में कुछ नहीं माँगता।