वह एक ऐसे संसार से होकर गुजरते हैं, जो खिला हुआ है — दोनों ओर खिलते हुए कमल, उनके चरणों में मोर, ऊपर मेहराब के दोनों ओर पौराणिक जीव। उनका एक हाथ उठा हुआ है, चेतावनी देने के लिए नहीं, बल्कि ऐसे व्यक्ति के शांत हावभाव में जिसने सब कुछ देख लिया है और फिर भी उपस्थित रहना चुना है। उनके मुकुट पर अर्धचंद्र विराजमान है। गंगा नदी उनके जटाजूट बालों से धुएँ की तरह निकल रही है।
केरल के भित्तिचित्रकारों ने शिव के इसी रूप को दर्शाया है — भस्म लगाए हुए तपस्वी के रूप में नहीं, बल्कि ऐसे व्यक्ति के रूप में जो जीवित प्राणियों के बीच चलता है। वह जिसने विष को अपने गले में धारण किया है ताकि संसार साँस ले सके। उस छवि में कुछ ऐसा है जो हर उस व्यक्ति से बात करता है जिसने कुछ कठिन निगला है और फिर भी आगे बढ़ता रहा है।