एक दुनिया और दूसरी दुनिया के बीच, जब जल हर चीज़ को निगल चुका था और अभी तक कुछ भी अस्तित्व में नहीं आया था, एक बरगद का पत्ता बाढ़ पर तैर रहा था। उस पर एक नीला बच्चा लेटा हुआ था—सजाया हुआ, धीर-गंभीर, एक घुटना ऊपर की ओर, ठोड़ी मुड़ी हुई भुजाओं पर टिकी हुई। मछलियाँ उसके नीचे घूम रही थीं। कमल वैसे ही खिल रहे थे। वह प्रतीक्षा नहीं कर रहा था। वह बस था।
इस छवि में कुछ ऐसा है जिसका पौराणिक कथाओं से कोई लेना-देना नहीं है। यह एक बच्चे की स्थिरता है जो अभी तक दुनिया के बोझ को नहीं जानता—और उस अनभिज्ञता में, वह इसे पूरी तरह से धारण किए हुए है।